बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी अब पूरे उफ़ान पर है। सियासी गलियारों में सबसे ज़्यादा चर्चा अगर किसी की हो रही है, तो वो हैं — प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी।
एक समय था जब प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में तीसरे मोर्चे के मजबूत विकल्प के तौर पर उभरे थे। उनकी आक्रामक रणनीति, गाँव-गाँव पदयात्रा और साफ़-सुथरी राजनीति के दावे ने जनता के बीच गहरी पैठ बनाई थी।
जन सुराज का वोट प्रतिशत बढ़ा था, ख़ासकर युवाओं और पहली बार वोट देने वाले वर्ग में। प्रशांत किशोर का बोलने का अंदाज़, जनता के मुद्दों को सीधी ज़मीन से जोड़ने की कला, और “व्यवस्था बदलने” की बातों ने उन्हें सुर्ख़ियों में ला दिया था।
लेकिन अब सवाल यह है — क्या वही रफ़्तार बरक़रार है?
पिछले कुछ महीनों में देखा गया है कि प्रशांत किशोर का आक्रामक तेवर कुछ कम हुआ है।
न जनसभाओं में वह पुराने जोश से दिख रहे हैं, न ही मीडिया पर उनके बयान उतनी हलचल मचा रहे हैं जितनी पहले करते थे।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इससे जन सुराज का वोट प्रतिशत थोड़ा गिरा है, ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में जहां उनका कैम्पेन पहले बहुत प्रभावशाली था।
🔍 अब सवाल – कौन जीतेगा बिहार 2025?
NDA (भाजपा + जदयू + सहयोगी दल): नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी की जोड़ी अब भी संगठनात्मक स्तर पर मज़बूत है। भाजपा का कैडर एक्टिव है और नीतीश कुमार का जातिगत समीकरण अब भी असरदार माना जा रहा है। NDA का वोट बैंक स्थिर है, लेकिन एंटी-इन्कम्बेंसी फैक्टर अब भी एक चुनौती बना हुआ है। INDIA गठबंधन (राजद + कांग्रेस + वामदल): तेजस्वी यादव अपनी रोज़गार नीति और युवाओं को जोड़ने के एजेंडे पर मैदान में हैं। लेकिन अंदरखाने की गुटबाज़ी और सीट बँटवारे को लेकर मतभेद, गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जन सुराज (प्रशांत किशोर): तीसरे मोर्चे के तौर पर जनता उन्हें “परिवर्तन का चेहरा” मानती है, लेकिन संगठनात्मक ढाँचा और सीटों पर मज़बूत उम्मीदवारों की कमी अब भी उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। अगर प्रशांत किशोर फिर से आक्रामक रणनीति अपनाते हैं, और जनसंपर्क बढ़ाते हैं, तो वे 20–25% वोट शेयर तक पहुँच सकते हैं — जो बिहार की सत्ता समीकरण बदलने के लिए पर्याप्त होगा।
🔔 निष्कर्ष:
बिहार 2025 का चुनाव त्रिकोणीय मुकाबला बन चुका है।
जहाँ NDA सत्ता बचाने में जुटा है, INDIA वापसी की कोशिश में है,
वहीं जन सुराज बदलाव की लहर बनने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन अगर प्रशांत किशोर अपने पुराने जोश और आक्रामक कैंपेन में नहीं लौटे,
तो यह लहर ठंडी पड़ सकती है — और मुकाबला फिर NDA बनाम INDIA तक सिमट सकता है।
